रविवार, 5 सितंबर 2010

शिक्षक दिवस पर : कैसी हो हमारी शिक्षा

आज शिक्षक दिवस है ! बचपन में तो इस दिन का ख्याल रहता था ! आज के दिन गाँव में एक विशेष कार्यक्रम अपने मित्रो के सहयोग से हम किया करते थे ! अपने गाँव और आसपास के स्कूलों के गुरूजीओ को इकठ्ठा करना और सबका अभिनन्दन और सम्मान करना ! कुछ भाषणबाजी और थोडा स्वल्पाहार यही था कुल मिलकर कर्यक्रम का स्वरुप !
आज जब समाचार पत्र में इस दिन के निमित्त कुछ आलेख दिखे तो ध्यान आया कि आज ५ सितम्बर है ! डा० सर्वपल्ली राधाक्र्ष्णन , हमारे पूर्व राष्ट्रपति का जन्म दिवस यानि शिक्षक दिवस ! आज शिक्षक , शिक्षा , शिक्षा पद्धति आदि विषयो पर व्याख्यान होंगे और कुछ गुरुजनों को सम्मानित भी किया जावेंगा !
"शिक्षा समाज का दर्पण होती है " यह आज भी जब मैं पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ कि यह बात अंग्रेज हम से ज्यादा अच्छी तरह समझते थे ! जैसी शिक्षा दी जावेंगी वैसा समाज बनेगा ! इसलिए कैसी शिक्षा होना इस प्रश्न का उत्तर इस बात में निहित है कि हम कैसा समाज बनाना चाहते है ! अंग्रेज यह जानते थे कि उन्हें ऐसा समाज बनाना है, जो अंगरेजी में गिटरपिटर तो करे पर अंग्रेजो के खिलाफ कुछ ना बोले ! उन्हें अपने साम्राज्य की नीव पक्की करने वाले मन से अंग्रेज चाहिए थे और उन्होंने मैकाले की शिक्षा पद्धति वाला कारखाना यहाँ बिठाया जिसे हम आजादी के इतने वर्षो बाद भी चलाये जा रहे है !
आज हमारे नौजवान कृषि में स्नातक की डिग्री लेने के बाद भी खेती नहीं करना चाहते ! वे चाहते है फाईलो में उसके आदेश से धान और गेहू बो दिया जावे और उसके हस्ताक्षर से आदेश जारी होते ही फसल काट ली जावे ! आज भी सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले बाबू पैदा करने वाली मशीनरी ही है हमारी शिक्षा प्रणाली !
अंग्रेजो के जाते ही हमारे देश में जैसे और चीजे बदली गयी वैसे ही शिक्षा प्रणाली को हमें सबसे पहले बदल कर अपनी आवश्यकता के अनुसार बनाना था ! शिक्षा के क्षेत्र में नित नए प्रयोग करना यही भर हो रहा है आजकल ! क्या हमारे नीती निर्धारक राजनेता , प्रशासनिक अधिकारी , शिक्षाविद कभी इस विषय में सोचेंगे !